गुरुवार 20 अगस्त 2026 - 17:44
भारतीय धार्मिक विद्वानों का परिचय | मौलाना सैयद अम्मार हैदर आबिदी

पेशकश: दनिश नामा-ए-इस्लाम, इन्टरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर दिल्ली

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मेराजुल औलमा मौलाना सैयद अम्मार हैदर आबिदी 10 शव्वालुल मुकर्रम 1362 हिजरी को सरज़मीने नौगांवाँ सादात, ज़िला अमरोहा, सूबा उत्तर प्रदेश में पैदा हुए।

आप ने इब्तिदाई तालीम अपने वालिद मौलाना सैयद मुहम्मद मुजतबा की ज़ेर-ए-निगरानी जामिआ आलिया जाफ़रिया में हासिल की, जहाँ अरबी, फ़ारसी, उर्दू, हिन्दी, फ़लसफ़ा, मंतिक, फ़िक़्ह व उसूल में ग़ैर मामूली महारत हासिल की।

मज़ीद हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर आप ने “जवादिया अरबी कॉलेज” बनारस का रुख़ किया। उस ज़माने में यह मदरसा ज़फ़रुल मिल्लत मौलाना सैयद ज़फ़रुल हसन की सरपरस्ती में इल्मी इर्तिक़ा की मनाज़िल तय कर रहा था। आप ने यहाँ क़याम के दौरान तहसील-ए-इल्म में बेपनाह मेहनत की और नुमायाँ कामयाबियाँ हासिल कीं।

अभी आप की उम्र तक़रीबन बीस बरस ही थी कि मुख़्तलिफ़ उलूम व फ़ुनून में महारत हासिल करने के बाद नजफ़े अशरफ़ (इराक़) का रुख़ किया। मौसूफ़ ने नजफ़े अशरफ़ में बारह बरस तक क़याम किया और मुजतहेदीन-ए-आलाम व फ़ुक़हाए इज़ाम के बहर-ए-बेकराँ से फ़ैज़ हासिल किया। जिन अकाबिर औलमा से आप ने इस्तेफ़ादा किया, उन में हज़रत आयतुल्लाह सैयद जमालुद्दीन ख़ूई, आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अबुलक़ासिम ख़ूई, आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद मोहसिन हकीम, आयतुल्लाहुल उज़्मा सैयद मुहम्मद हुसैनी शाहरूदी, आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अब्दुल आला सब्ज़वारी और आयतुल्लाहिल उज़्मा शैख़ मुहम्मद अली मुदर्रिसे अफ़ग़ानी के नाम नुमायाँ हैं।

तालीम की तकमील के बाद आप नजफ़े अशरफ़ से अपने वतन वापस तशरीफ़ लाए और हिन्दुस्तान के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में तब्लीग़-ए-दीन में मसरूफ़ हो गए। तब्लीगी सरगर्मियों के साथ-साथ आप ने जामिआ आलिया जाफ़रिया की तरक़्क़ी पर भी ख़ुसूसी तवज्जो दी। चूँके उस वक़्त जामिया की कोई मुस्तक़िल इमारत ना थी, लिहाज़ा आप की काविशों से पहले उस की तामीर अमल में आई। बाद अज़ाँ तश्नगाने -ए-उलूम-ए-आले मुहम्मद की बढ़ती हुई ज़रूरत को महसूस करते हुए मोहल्ला अली नगर, नौगांवाँ सादात में एक वसीअ व अरीज़ जदीद इमारत का बेड़ा उठाया, जो पाया-ए-तक्मील को पहुँची।

मेराजुल औलमा मैदान-ए-ख़िताबत में भी यकता-ए-रोज़गार थे। आप की मोअस्सिर और पुरअसर ख़िताबत से मोमेनीन बेपनाह फ़ैज़याब होते।

आप ने दर्स व तदरीस के ज़रिए हज़ारों शागिर्दों की तरबियत फ़रमाई, जो आज दुनिया के मुख़्तलिफ़ ममालिक में दीनी व मिल्ली ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं। उन में मौलाना रियाज़ अकबर चितोड़वी (अफ़्रीका), मौलाना ग़ज़नफ़र अब्बास तूसी, मौलाना शैख़ मुजतबा हैदर आज़मी, मौलाना इलियास हैदर चितोड़वी, मौलाना सैयद सुल्तान अली सरियानवी, मौलाना सैयद कलबे हुसैन और दीगर मुमताज़ औलमा शामिल हैं।

तालीमी व तब्लीगी ख़िदमात के साथ-साथ आप ने तहरीरी मैदान में भी गराँक़द्र ख़िदमात अंजाम दीं। आप की तसानीफ़ में “जाफ़रिया जन्तरी” (जो हर साल बिलाअवज़ शाए होकर मोमिनीन तक पहुँचती है), “तशरीहुल कबाइर” और “रिसाला-ए-हुर” क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।

अल्लाह ने आप को दो बेटियाँ और तीन बेटे अता फ़रमाए, जिन में सैयद ज़िल्ले मुज्तबा नजफ़ी, मौलाना सैयद कौकब मुज्तबा और सैयद ज़फ़र मुज्तबा ख़ास तौर पर मशहूर हैं।

26 जमादिउल अव्वल 1429 हिजरी को आप जामिया आलिया जाफ़रिया में तदरीसी फ़राइज़ अंजाम देने के बाद नमाज़-ए-ज़ोहरैन की तैय्यारी के लिए उठे, वुज़ू का पानी लिया और जामिया की आई.टी.आई. इमारत के बरामदे में बैठ गए। अभी वुज़ू का आग़ाज़ ही किया था कि अचानक सीने में शदीद दर्द महसूस हुआ और यही दर्द इल्म व फ़ज़्ल के उस दरख़्शाँ आफ़्ताब के गुरूब का सबब बन गया। यूँ आप अपने मअबूद-ए-हक़ीक़ी से जा मिले।

आप के इर्तेहाल की ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई। मोमिनीन जौक़ दर जौक़ नौगांवाँ सादात पहुँचने लगे और देखते ही देखते एक अज़ीमुष्शान मजमा जमा हो गया। बिलआख़िर चाहने वालों की आह व फ़ुग़ाँ के दरमियान मौलाना को जामिया आलिया जाफ़रिया, मोहल्ला अली नगर के अहाते में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।

माखूज़ अज़: मौलाना गाफिर रिज़वी छौलसी व मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-285 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2025ईस्वी।  

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